वैदिक मनोविज्ञान ब्रम्ह विज्ञान से शुरू होता हैं।
गुरु से की आप को गुरु की प्राप्ति कैसे हुई और किस किस्म के आप के गुरु हैं , आधुनिक मनोविज्ञान ने समानता के साथ भिन्नता भी हैं ,गुरु कैसा हो इस की परख भी होनी आवश्यक होता हैं, भगवान राम चन्द्र के भी गुरु थे फिर भी उन का सवाल आज भी पूछा जा सकता हैं की गुरु कैसे हो ?
- गुरु के पास चित की एकाग्रता होती हो, बैचेनी नही आती हो, उदासी, निराश के भाव नही आना चाहिए।
- गुरु जी ज़ुबान पर संतुलन हो नियंत्रण हो अपनी बात पर अधिकार हो और आप के बंधन को खोल दे ।
- गुरु को काम क्रोध मद,लोभ की सीमा रेखा हो और मर्यादा को नही लगता हो।
- स्वंय गुरु की खोज करने की बजाय भगवान से प्रार्थना से आप को गुरु प्राप्त हो जिस के पीछे मूल कारण की आप को अहंकार की सीमा में बांध जाओ।
गुरु को बदला नही जाता परन्तु अपवाद उन का विस्तार किया जा सकता जैसे भगवान दत्तात्रेय जी के 24 गुरु थे। गुरु बताते क्षीर-नीर में क्या फर्क हैं।
सोना-पीतल दोनों पिली धातु है फिर भी उस में भेद हैं।साप-रस्सी दोनों रात्रि के समान दीखते परन्तु उस में भी भेद और ये भेद जब बन जाते तो मन भटकाव में आ जाता। इस प्रकार इस शरीर रूपी क्षेत्र में पृथ्वी के समान बहुत सारे बीज दबे रहते और कभी कभी बे वक्त मौसम की तरह प्रतिकूल अवस्था में अनुकूल प्रभाव पैदा हो जाता और विक़ार पैदा कर जाता हैं, तब गुरु की जरूरत पडती हैं।
समय बड़ा होता है। परन्तु ज्ञात हो भी अज्ञात हो जिस का आज कारण मैं के अस्तित्वहीन का आचार सहिता में चेतन अवस्था की पराकाष्ठ्ता हीनता जो शून्यकाल के प्रवेश कर जाती है जिस से गलतीयों को स्थान परिवर्तन में स्वीकार्य होती है, वहा वर्तमान दीखता है।
आज बस इतना ही….