दिन भर कार्य करने से शरीर के सभी अंग थक जाते हैं।
उनको विश्राम की अपेक्षा होती है।
इंद्रियॉ विशेषकर थक जाती हैं और मन में लीन हो जाती है।
फिर मन मनोवह नाड़ी के द्वारा पुरीतत् नाड़ी में विश्राम के लिए चला जाता है।
वहाँ पहुँचने के पहले, पूर्वकर्मों के संस्कारों के कारण तथा वात, पित्त और कफ इन तीनों के वैषम्य के कारण, अदृष्ट के सहारे उस समय मन को अनेक प्रकार के विषयों का प्रत्यक्ष होता है,
जिसे स्वप्नज्ञान कहते हैं।
आज बस इतना ही…..