बौद्ध संप्रदाय में सहजयान और वज्रयान में भी स्त्री साहचर्य की अनिवार्यता स्वीकार की गई है और बौद्ध साधक अपने को ‘कपाली’ कहते थे ।

प्राचीन साहित्य में कपालकुंडला और अघोरघंट का उल्लेख आया है। इस ग्रंथ से कापालिक मत के संबंध में कुछ स्थूल तथ्य स्थिर किए जा सकते हैं। कापालिक मत नाथ संप्रदायियों और हठयोगियों की तरह चक्र और नाड़ियों में विश्वास करता था। उसमें जीव और शिव में अभिन्नता मानी गई है। योग से ही शिव का साक्षात्कार संभव है। शिव का शक्तिसंयुक्त रूप ही समर्थ और प्रभावकारी है। शिव और शक्ति के इस मिलनसुख को ही कापालिक अपनी कपालिनी के माध्यम से अनुभव करता है जिसे वह महासुख की संज्ञा देता है। सोम को कपालिक (स अ उमा) शक्तिसहित शिव का भी प्रतीक मानता है और उसके पान से उल्लसित हो योगिनी के साथ विहार करते हुए अपने को कैलासस्थित शिवउमा जैसा अनुभव करता है। मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा और मिथुन – इस पंचमकारों के साथ कापालिकों, शाक्तों और वज्रयानी सिद्धों का समानत: संबंध था और पूर्वमध्यकाल की साधनाओं में इनका महत्वपूर्ण स्थान था।इसी कपालिक पूजा पद्धति के तीसरे मत से बाबा बैद्यनाथ की पूजा होती है ।
आज बस इतना ही….