
शिवलिंग को भगवन शिव के गुप्तांग के रूप में प्रचारित किया जाता है। जोकि पूरी तरह गलत है। इस विषय में गलत प्रचार की वजह से हिन्दू भी शिवलिंग को शिव भगवान का गुप्तांग समझने लगे हैं और दूसरे हिन्दुओ को भी ये गलत जानकारी देने लगे हैं। इस आधार पर शिवलिंग की पूजा की आलोचना भी की जाती हैं। जबकि सच्चाई इससे बिलकुल अलग है। सभी भाषाओं की जननी देववाणी संस्कृत में लिंग का अर्थ ‘चिन्ह या प्रतीक’ होता है, जबकी जननेंद्रिय को संस्कृत मे ‘शिशिन’ कहा जाता है। इस प्रकार शिवलिंग का अर्थ हुआ ‘शिव का प्रतीक’।
जैसे पुलिंग का अर्थ हुआ पुरुष का प्रतीक इसी प्रकार स्त्रीलिंग का अर्थ हुआ स्त्री का प्रतीक और नपुंसकलिंग का अर्थ हुआ नपुंसक का प्रतीक। अब यदि जो लोग पुरुष लिंग को पुरुष की जनेन्द्रिय समझ कर आलोचना करते है, तो उनके अनुसार ‘स्त्री लिंग’ का अर्थ ‘स्त्री का लिंग’ होना चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं है, इस तरह यह बात साबित हो जाती है कि शिवलिंग का अर्थ लिंग या योनी नहीं होता। वैसे भी ‘शिवलिंग’ शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने से इसे लिंग कहा गया है। बागेश्वर जिले के कांडा स्थित माता वैष्णवी की सहित कई स्थानों पर देवियों की पार्थिव मूर्तियों को भी लिंग कहा जाता है। स्कन्द पुराण में यह भी कहा गया है कि आकाश स्वयं लिंग है। वातावरण सहित घूमती धरती तथा सारे अनन्त ब्रह्माण्ड ( क्योंकि, ब्रह्माण्ड गतिमान है ) का अक्स/धुरी (axis) ही लिंग है। शिव लिंग का अर्थ अनन्त भी होता है अर्थात जिसका कोई अन्त नहीं है और ना ही शुरुआत।
दरअसल यह गलतफहमी भाषा के रूपांतरण और संस्कृत न जानने वाले मलेच्छों-यवनों के द्वारा हमारे पुरातन धर्म ग्रंथों को नष्ट कर दिए जाने पर तथा बाद में षडयंत्रकारी अंग्रेजों के द्वारा इसकी गलत व्याख्या करने से उत्पन्न हुई है।जैसा कि हम सभी जानते हैं कि एक ही शब्द के विभिन्न भाषाओँ में अलग-अलग अर्थ निकलते हैं। उदाहरण के लिए, यदि हम हिंदी के एक शब्द “सूत्र” को ही ले लें तो सूत्र का मतलब डोरी/धागा, गणितीय सूत्र कोई भाष्य अथवा लेखन भी हो सकता है। जैसे कि नासदीय सूत्र ब्रह्म सूत्र इत्यादि । उसी प्रकार ‘अर्थ’ शब्द का भावार्थ सम्पति भी हो सकता है, और मतलब (मीनिंग) भी । ठीक इसी प्रकार शिवलिंग के सन्दर्भ में लिंग शब्द से अभिप्राय चिह्न, निशानी, गुण, व्यवहार या प्रतीक है।
धरती उसका पीठ या आधार है और सब अनन्त शून्य से पैदा हो उसी में लय होने के कारण इसे लिंग कहा है। तथा प्रकाश स्तंभ/लिंग, अग्नि स्तंभ/लिंग, उर्जा स्तंभ/लिंग, ब्रह्माण्डीय स्तंभ/लिंग (cosmic pillar/lingam) जैसे कई अन्य नामों से भी संबोधित किया गया है।
ब्रह्माण्ड में दो ही चीजे हैं: ऊर्जा और प्रदार्थ। हमारा शरीर प्रदार्थ से निर्मित है और आत्मा ऊर्जा है। इसी प्रकार शिव पदार्थ और शक्ति ऊर्जा का प्रतीक बन कर शिवलिंग कहलाते हैं। ब्रह्मांड में उपस्थित समस्त ठोस तथा ऊर्जा शिवलिंग में निहित है। वास्तव में शिवलिंग हमारे ब्रह्मांड की आकृति है (The universe is a sign of Shiva Lingam)।
शिवलिंग भगवान शिव और देवी शक्ति (पार्वती) का आदि-अनादि एकल रूप है तथा पुरुष और प्रकृति की समानता का प्रतीक भी है। अर्थात इस संसार में न केवल पुरुष का और न केवल प्रकृति (स्त्री) का वर्चस्व है अर्थात दोनों समान हैं।
अब बात करते हैं ‘योनि’ शब्द की। मनुष्ययोनि, पशुयोनि, पेड़-पौधों की योनि, जीव-जंतुओं की योनि। योनि का संस्कृत में अर्थ प्रादुर्भाव या प्रकटीकरण होता है।कहा जाता है जीव अपने कर्म के अनुसार विभिन्न योनियों में जन्म लेता है। किन्तु कुछ धर्मों में पुनर्जन्म की मान्यता ही नहीं है। इसीलिए वे योनि शब्द के संस्कृत अर्थ को नहीं जानते हैं। जबकी हिंदू धर्म मे 84 लाख प्रकार के योनि बताई जाती हैं। यानी 84 लाख प्रकार के जन्म हैं। अब तो वैज्ञानिकों ने भी मान लिया है कि धरती में 84 लाख प्रजीव (पेड़, कीट,जानवर,मनुष्य आदि) है।“मनुष्य योनी” : पुरुष और स्त्री दोनों को मिलाकर मनुष्य योनि होता है। अकेले स्त्री या अकेले पुरुष के लिए मनुष्य योनि शब्द का प्रयोग संस्कृत में नहीं होता है। तो कुल मिलकर लिंग का तात्पर्य प्रतीक से है। शिवलिंग का मतलब है पवित्रता का प्रतीक। दीपक की प्रतिमा बनाये जाने से इस की शुरुआत हुई, बहुत से हठ योगी दीपशिखा पर ध्यान लगाते हैं। हवा में दीपक की ज्योति टिमटिमा जाती है और स्थिर ध्यान लगाने की प्रक्रिया में अवरोध उत्पन्न करती है। इसलिए दीपक की प्रतिमा स्वरूप शिवलिंग का निर्माण किया गया। ताकि निर्विघ्न एकाग्र होकर ध्यान लग सके। लेकिन मुग़ल काल में कुछ विकृत व गंदी मानसिकता बाले तथा गोरे अंग्रेजों के गंदे दिमागों ने इस में गुप्तांगो की कल्पना कर ली और झूठी कुत्सित कहानियां बना ली और इसके पीछे के रहस्य की जानकारी न होने के कारण अनभिज्ञ भोले हिन्दुओं को भ्रमित किया गया |आज भी बहुतायत हिन्दू इस दिव्य ज्ञान से अनभिज्ञ है।
हिन्दू सनातन धर्म व उसके त्यौहार विज्ञान पर आधारित है। जोकि हमारे पूर्वजों ,संतों ,ऋषियों-मुनियों तपस्वीयों की देन है। आज विज्ञान भी हमारी हिन्दू संस्कृति की अदभुत हिन्दू संस्कृति व इसके रहस्यों को सराहनीय दृष्टि से देखता है व उसके ऊपर रिसर्च कर रहा है।
आज बस इतना ही…..