कभी आपने सोचा है कि जब आप किसी मंदिर में जाते हैं तो कुछ लोग देव मूर्ति को अपना सर झुका के प्रणाम करते हैं तो कुछ लोग साष्टांग दंडवत यानी प्रणाम करते हैं आइये जानते हैं की इसका वैदिक विज्ञान और मनोविज्ञान क्या है..?
जब आप मंदिर में जाये तो सबसे पहले मौन हो जाएं और आंखें बंद कर लें यानी बाहर के दुनिया से काटकर दृश्य से अदृश्य की ओर आपका यात्रा प्रारंभ होता है । अब आप स्वेयं को खोलने का प्रयत्न करें । दोनो हाथ सामने जोड़कर सिर सीधा उठाकर देव विग्रह के तरफ ध्यान को केंद्रित करें । कुछ देर के बाद यह अनुभव होगा कि अंदर एक तरह की ऊर्जा प्रवाहित हो रही है जिससे आपका अस्तित्व प्रभावित हो रहा है ।
जैसे ही ऊर्जा या प्राण आपके जुड़े हुए हथेली से होते हुए बाहों से होकर नीचे की ओर बहेगा , वैसे ही आपको हल्के कंपन का अहसास होगा । धीरे धीरे आप हवा में कांपते पत्ते की भांति हो जाय । शरीर को ऊर्जा से झनझना जाने दें । आपके अंदर जो भी घटना घट रहा है उसे घटित होने दें । जब भी आप पूरी तरह भरे हुए अनुभव करें , तो आप आगे की ओर झुक जाए माथे को पृथ्वी से लगा लें ।दोनो हाथ सिर के आगे पूरे फैले रहैंऔर हथेलियां भी पृथ्वी को स्पर्श करती रहे ।पृथ्वी की ऊर्जा के साथ दिव्य ऊर्जा के मिलन के आप बाहक बन जाएं।
अब पृथ्वी के साथ प्रवाहित होने का और बहने का अनुभव करें ।अनुभव करें कि पृथ्वी और स्वर्ग , ऊपर और नीचे ,पुरुष और नारी – सभी एक महा आलिंगन मे आबद्ध है । आप उसमें बह जाएं ,घुल जाएं ।अपने को पूरी तरह छोड़ दें ।दोनो चरणों को छह बार दोहराएं , ताकि सभी सात चक्रों तक ऊर्जा गति कर सके । इन्हें अधिक बार भी दोहराया जा सकता है , लेकिन सात से कम पर बेचैनी अनुभव होगी ।
प्रार्थना के बाद पंद्रह मिनट का विश्राम आवश्यक है , अन्यथा तंद्रा में होने का एहसास होता रहेगा ।यह ऊर्जा में निमज्जन होने की क्रिया है ।यह प्रार्थना आपको पूरी तरह बदल देती है , और आपके बदलते ही आपका अस्तित्व भी बदल जाता है ।
आज बस इतना ही….