स्थूल के विरुद्ध सूक्ष्म के प्रति आकर्षण स्वभावतः उत्पन्न हो जाता है। श्रौतयज्ञों के सन्दर्भ में भी, जनमानस में, विशेष रूप से प्रबृद्ध वर्ग में, इसी प्रकार का आकर्षण शनैःशनैः उत्तरोत्तर अभिवृद्ध हुआ। यज्ञ के द्रव्यात्मक स्वरूप के बहुविध स्वरूप–विस्तार में, जब उसका वास्तविक मर्म ओझल होने लगा, तो यह आवश्यकता गहराई से अनुभव की गई कि श्रौतयज्ञों की आध्यात्मिक व्याख्या की जाए। ब्राह्मण ग्रन्थों के उत्तरार्द्ध में, इसी दृष्टिकोण को प्रधानता प्राप्त हुई और उसमें वैदिक यज्ञों के अन्तर्तम में निहित गम्भीर अर्थवत्ता, वास्तविक मर्म और आध्यात्मिक रहस्यों के सन्धान के लिए जिस चिन्तन को आकार मिला, उसी का नामकरण आरण्यक–साहित्य के रूप में हुआ। आरण्यक ग्रन्थ ब्राह्मण ग्रन्थों एवं उपनिषदों के मध्य की कड़ी है। उपनिषदों में जिन आध्यात्मिक तत्त्वों को हम अत्युच्च शिखर पर आरूढ़ देखते हैं, उनकी पृष्ठभूमि आरण्यकों में ही निहित है। वेदोक्त सामाजिक व्यवस्था में, आश्रम–प्रणाली का विशेष महत्त्व है। ब्राह्मणग्रन्थोक्त श्रौतयज्ञों के अनुष्ठान के अधिकारी गृहस्थाश्रमी माने गए हैं। इसके पश्चात् वानप्रस्थाश्रम में प्रविष्ट व्यक्तियों के लिए, वैदिक वाङ्मय में,आरण्यक–साहित्य विशेष उपादेय समझा गया है। पचास वर्ष से अधिक अवस्था वाले ऐसे व्यक्तियों में जो श्रौतयज्ञों के स्थूल द्रव्यात्मक स्वरूप से सुपरिचित थे, अब इस स्वरूप के वास्तविक मर्म की जिज्ञासा स्वभावतः अधिक थी। इन्हीं की बौद्धिक जिज्ञासाओं के शमन के लिए आरण्यक–साहित्य का प्रणयन हुआ।
आरण्यक–ग्रन्थ ब्राह्मण–ग्रन्थों की ही शृंखला में, वस्तुतः, उनके उत्तरार्द्ध भाग में संकलित हैं। कर्मकाण्ड के साथ दोनों का ही सम्बन्ध है, इसलिए ये एक ही परम्परा से अनुस्यूत हैं। राजा जनक के द्वारा सर्वश्रेष्ठ सत्त्वेत्ता को 100 गाय देने की आख्यायिका शतपथ ब्राह्मण के साथ ही बृहदारण्यक में भी उपलब्ध होती है। बृहदारण्यक में केवल इतनी विशिष्टता है कि उसमें याज्ञवल्क्य और तत्कालीन अन्य तत्वचिन्तकों के मध्य हुआ दार्शनिक तत्वों पर विशद विचार–विमर्श भी सम्मिलित है। इससे स्पष्ट है कि आरण्यक भाग ब्राह्मणग्रन्थों पर निर्भर है। इस सन्दर्भ में, इतना और ज्ञातव्य है कि आरण्यक–ग्रन्थ ब्राह्मणग्रन्थों के विशद तथा दार्शनिक स्वरूप के परिचायक है। डॉ. राधाकृष्णन के अनुसार ब्राह्मणग्रन्थों में उन कर्मकाण्डों का विवेचन है, जिनका विधान गृहस्थ के लिए था, किन्तु वृद्धावस्था में जब वह वनों का आश्रय लेता है तो, कर्मकाण्ड के स्थान पर किसी अन्य वस्तु की उसे आवश्यकता होती थी और आरण्यक उसी विषय की पूर्ति करते हैं।

आरण्यकों का मुख्य प्रतिपाद्य विषय भी याज्ञिक कर्मकाण्ड के दार्शनिक पक्ष का उदघाटन है। दुर्गाचार्य ने निरुक्त–भाष्य में ‘ऐतरेयके रहस्य–ब्राह्मणे’ कहकर आरण्यकों के लिए ‘रहस्य–ब्राह्मण’ नाम का उल्लेख किया है। गोपथ ब्राह्मण में भी ‘रहस्य’ शब्द का व्यवहार इस सन्दर्भ में दिखलाई देता है।
आरण्यक यज्ञ के गूढ़ रहस्य का प्रतिपादन करते हैं। ‘रहस्य’ शब्द से अभिहित की जाने वाली ब्रह्मविद्या की भी इसमें सत्ता है। आरण्यकों का मुख्य प्रतिपाद्य विषय प्राणविद्या तथा प्रतीकापासना है। वे प्राणविद्या को अपनी अनोखी सूझ नहीं बतलाते, प्रत्युत ऋग्वेद के मन्त्रों को अपनी पुष्टि में उदधृत करते हैं, जिनमें प्राणविद्या की दीर्घकालीन परम्परा का इतिहास मिलता है।उपनिषदों के समान आरण्यक–ग्रन्थ भी एक ही मूलसत्ता को मानते हैं, जिसका विकास इस सृष्टि के रूप में हुआ है।
तैत्तिरीय–आरण्यक में काल का निदर्शन बहुत सुन्दरता से किया गया है। काल निरन्तर प्रवाहमान है। अखण्ड संवत्सर के रूप में हम इसी पारमार्थिक काल के दर्शन करते हैं। व्यावहारिक काल अनेक तथा अनित्य है। व्यवहार की दृष्टि से उसके अनेक भाग मुहूर्त्त, दिन, रात, पक्ष, मास इत्यादि रूपों में किए जाने पर भी वस्तुतः वह एकरूप अथवा एकाकार ही रहता है। इस सन्दर्भ में नदी का दृष्तान्त दिया गया है, जो अक्षय्य स्रोत से प्रवाहित होती है, जिसे नाना सहायक नदियाँ आकर पुष्ट बनाती हैं, तथा जो विस्तीर्ण होकर भी नहीं सूखती हैं।
प्राणविद्या के महत्त्व का निरूपण आरण्यकों में विशेष रूप से है। ऐतेरेय–आरण्यक का यह विशिष्ट प्रतिपाद्य है। तदनुसार प्राण इस विश्व का धारक है, प्राण की शक्ति से जैसे यह आकाश अपने स्थान पर स्थित है, उसी प्रकार सर्वोच्च प्राणी से लेकर चींटी तक समस्त प्राणी इसी प्राण के द्वारा प्रतिष्ठित हैं–
यज्ञोपवीत का सर्वप्रथम उल्लेख तैत्तिरीय आरण्यक में है। वहाँ कहा गया है कि यज्ञोपवीत–धारण करके जो व्यक्ति यज्ञानुष्ठान करता है, उसका यज्ञ भलीभाँति स्वीकार किया जाता है–ऐसा यज्ञोपवीतधारी व्यक्ति जो कुछ भी पढ़ता है, वह यज्ञ ही है। ‘श्रमण’ शब्द का प्रयोग तैत्तिरीय आरण्यक में तपस्वी के अर्थ में हुआ है। कालान्तर से, बौद्ध काल में, यह शब्द बौद्धभिक्षुओं का ज्ञापक बन गया। इसी आरण्यक में एक सहस्र धुरों वाले, बहुसंख्यक चक्रों वाले तथा सहस्र अश्वों वाले एक विलक्षण रथ का वर्णन है। काण्वशाखीय बृहदारण्यक में सन्यास का विधान स्पष्ट शब्दों में है। कहा गया है कि आत्मा का ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात् ही कोई मुनि होता है। इसी ब्रह्मलोक की इच्छा से संन्यासी संन्यास धारण करते हैं।
अधिकांश आरण्यक ब्राह्मणग्रन्थों के अन्तिम भाग हैं, इसलिए उन ब्राह्मणों के प्रवचनकर्ता ही, कतिपय अपवादों को छोड़कर, आरण्यकों के प्रवचनकर्ता हैं। उदाहरण के लिए ऐतरेय आरण्यक परम्परा के अनुसार, ऐतरेय–ब्राह्मण का अन्तिम भाग है, इसलिए ऐतरेय–ब्राह्मण के प्रवक्ता महिदास ऐतरेय को ही ऐतरेय–आरण्यक (तृतीय आरण्यक तक) का भी प्रवचनकर्ता माना जाता है। इस प्रकार का उल्लेख भी ऐतरेय–आरण्यक में है–
‘एतद्ध स्म वै तद्विद्वानाह महिदास ऐतरेयः’।
ऐतरेय आरण्यक के तृतीय आरण्यकान्त भाग के प्रवचनकर्ता महिदास ऐतरेय ही हैं। इनका विशद परिचय ऐतरेय–ब्राह्मण के अन्तर्गत दिया जा चुका है। ऐतरेय आरण्यक के अन्तर्गत चतुर्थारण्यक के प्रवचनकर्ता आश्वलायन तथा पञ्चम के शौनक माने जाते हैं। ऐतरेयारण्यक के भाष्य में सायण की भी यही धारणा है–
‘अतएव पञ्चमे शौनकेनोदाहताः।
ताश्च पञ्चमे शौनकेन शाखान्तरमाश्रित्य पठिताः।’
शांखायन–आरण्यक के द्रष्टा का नाम गुणाख्य शाङ्खायन है। इनके गुरु का नाम था कहोल कौषीतकि, जैसा कि इस आरण्यक के 15वें अध्याय में सुस्पष्ट उल्लेख है–
‘नमो ब्रह्मणे नम आचार्येभ्यो गुणाख्याच्छाङ्खायनादस्माभिरधीतं
गुणाख्यः शाङ्खायनः कहोलात्कौषीतकेः।’
बृहदारण्यक क प्रवचनकर्ता, परम्परा से महर्षि याज्ञवल्क्य माने जाते हैं, क्योंकि वही सम्पूर्ण शतपथ–ब्राह्मण के प्रवक्ता हैं और बृहदारण्यक शतपथान्तर्गत ही है। सायणाचार्य के अनुसार तैत्तिरीय–आरण्यक के रूप में प्रख्यात कृष्णयजुर्वेदीय आरण्यक के दृष्टा ऋषि कठ हैं–इस प्रकार इसे काठक–आरण्यक के नाम से अभिहित किया जाना चाहिए।मैत्रायणीय–आरण्यक ही मैत्रायणीय–उपनिषद् के रूप में विख्यात है। जैमिनीयोपनिषद ब्राह्मण, सामवेद के अन्तर्गत् ‘तलवकार–आरण्यक’ के नाम से प्रसिद्ध है। इसके अन्त में कश्यप से गुप्त लौहित्य तक ऋषि–नामों की सुदीर्घ शृंखला दी गई है
आरण्यकों की भाषा सामान्यतः ब्राह्मणों के सदृश ही हैं ऐतरेय–आरण्यक में, अनेक स्थलों पर ऐतरेय–ब्राह्मण के वाक्य भी ज्यों के त्यों उदधृत हैं। प्रायः यह वैदिकी और लौकिक–संस्कृत के मध्य की भाषा है। जैमिनीय शाखा के तलवकार–आरण्यक की भाषा में अन्य आरण्यकों की अपेक्षा, अधिक प्राचीन रूप सुरक्षित है। शैली में वर्णनात्मकता अधिक है। मन्त्रों के उद्धरणपूर्वक अपने प्रतिपाद्य का निरूपण करने की शैली आरण्यकग्रन्थों में प्रायः पाई जाती है। आरण्यकों के उन भागों में, जो आज उपनिषद के रूप में प्रतिष्ठित हैं, संवादमूलक संप्रश्न–शैली दिखलाई देती है।
वेद और उनके आरण्यक ऋग्वेद ऐतरेय और
शांखायन सामवेद तलवकार–आरण्यक(जैमिनीयोपनिषद)।
शुक्लयजुर्वेद बृहदारण्यक
कृष्णयजुर्वेद (तैत्तिरीय और काठक शाखा) तैत्तिरीयारण्यक
कृष्णयजुर्वेद (मैत्रायणी शाखा) मैत्रायणीयारण्यक
अथर्ववेद कोई आरण्यक प्राप्त नहीं उपनिषद
आज बस इतना ही…..