ईश्वर मतलब क्या …..?

कुछ लोगों का मानना है कि ईश्वर शब्द अवैदिक है और इसे प्रयोग करना अधर्म है क्योंकि उनलोगों का मानना है इसाई धर्म के ईशा से ईश्वर शब्द का निर्माण हुआ है । लेकिन , उपरोक्त सारे तथ्य गलत है । तो फिर ईश्वर है क्या और इसका मतलब क्या होता है , आइये जानते हैं ईश्वर का मतलब ।
वेद के अनुसार “ईश्वर” अवैदिक या अनार्य शब्द नहीं है | सबसे पहले उपनिषद का नाम ही इसी शब्द पर है ” ईशावास्योपनिषद ” | जिसका पहला यजु: (वह उपनिषद यजुर्वेद का हिस्सा है, चालीसवां अध्याय है) कहता है :– “ईशा का वास इस सब कुछ में है जो इस गतिशील जगत में है…”|
निराकार निरीच्छ ब्रह्म के उस स्वरुप को ईश्वर कहते हैं जिसमें एक ईच्छा है — सभी जीवों का कल्याण करने की इच्छा (यही “ईश्वर” का शब्दार्थ है)| अन्य सभी अर्थों में ब्रह्म और ईश्वर में कोई अन्तर नहीं है, ईश्वर भी निराकार हैं, अतः ब्रह्म की तरह ईश्वर की भी मूर्ति नहीं होती जिस कारण मूर्तिपूजकों ने ब्रह्म और ईश्वर को भुला दिया है और मनमानी गलत व्याख्याएं करते रहते हैं |
ब्रह्म ईच्छाओं से हीन होते हैं | एक इच्छा हो तो ईश्वर कहलाते हैं | उस एक ईच्छा की पूर्ती हेतु तीन चिह्नों (लिंगो, अर्थात त्रि-क-लिंग, जिसमें क का अर्थ है तैंतीस प्रकार के देवताओं के प्रतीक तैंतीस व्यंजनों में से प्रथम अर्थात ब्रह्म) के रूप में व्यक्त होते हैं , वे तीन हैं ब्रह्मा विष्णु और शिव | मानसिक रूप से बीमार लोगों का कहना है कि शिव अवैदिक या अनार्य हैं, जबकि यजुर्वेद की मैत्रायणी संहिता में “महादेव” के पूरे परिवार के सभी सदस्यों के नाम और उनके यजन हेतु मन्त्र दिया गए हैं |