आज जब व्यक्तिगत स्तर, आर्थिक स्तर और सामाजिक यानी संस्थागत तीनो स्तर पर विषमता फैल रही है तो इस विषमता को सम में आप्त (समाप्त) करने का एक मात्र उपाय यानी प्रथम और अन्तिम उपाय है (दर्शन और विज्ञान) (सेन्स और साईन्स) (धर्म और विज्ञान) (ज्ञान और विज्ञान) (सांख्य और योग) (सिद्धान्त और कर्म) (थ्योरी और प्रयोग), (प्रिन्सिपल और व्यवहार) (ज्ञान और उपयोग) इत्यादि सभी उभय पक्षी क्षेत्रों को अद्वैत किया जाये।
जिस तरह सिक्के के दो पहलू होते हुए भी वे दोनों पहलू दो सिक्के नहीं है। जिस तरह सिक्का अद्वैत है उसी तरह धर्म और विज्ञान भी अद्धैत है । (मिशन एवं प्रोफेशन) (ऑबजेक्ट एवं सब्जेक्ट) ( धर्म क्षेत्र और कुरू क्षेत्र ) ( कर्तव्य एवं अधिकार ) दोनों दो अलग-अलग नहीं होकर अभिन्न और अद्वैत हैं । इसी ज्ञान को जानना जीवन का परम्-अर्थ (परमार्थ) जानना कहा गया है।
आज बस इतना ही…..