वेद के रचनेवाले ऋषियों को भूत तथा भविष्य का ज्ञान प्रत्यक्ष के समान होता है।
उसमें इंद्रिय और अर्थ के सन्निकर्ष की आवश्यकता नहीं रहती।
यह “प्रातिभ” (प्रतिभा से उत्पन्न) ज्ञान या “आर्षज्ञान” कहलाता है।
यह ज्ञान विशुद्ध अत:करण वाले जीव में भी कभी कभी हो जाता है।
जैसे – एक पवित्र कन्या कहती है – कल मेरे भाई आवेंगे और सचमुच कल उसके भाई आ ही जाते हैं।
यह “प्रातिभ ज्ञान” है।
आज बस इतना ही….