भारतीय विद्वानों जैसे सायण, वेंकटमाधव का भाष्य जो डॉ. लक्ष्मण स्वरूप द्वारा सम्पादित है, स्वामी दयानन्द, सातवलेकर आदि ने ऋग्वेद पर लिखा है पर उनमें आपस में ही मतभेद है, वे विज्ञान की सहायता नहीं लेते हैं, वे किसी आधुनिक शोध विधि को भी नहीं अपनाते हैं। तथा संस्कृत शब्दों के विभिन्न अर्थों के आधार पर अपने-अपने अनुसार व्याख्या करते हैं। उन्होंने भी ऋषियों को कालानुसार व्यवस्थित नहीं किया है। फलतः ये विद्वान् भी विदेशी विद्वानों की तरह ऋग्वेद के देवताओं को न तो चिह्नित कर पाए हैं। और न उनके पारस्परिक सम्बन्धों को स्पष्ट कर पाए हैं और भिन्न-भिन्न अर्थ देते हैं। वे इन देवताओं की पूजा-अर्चना की बात करते हैं पर उसके पीछे छिपे अर्थों को स्पष्ट नहीं करते हैं।
भारतीय धर्मग्रन्थों में पंच तत्त्वों-आकाश, पृथ्वी, अग्नि, वायु और जल की बड़ी महिमा है। कहा तो यहाँ तक गया है कि सभी भौतिक पदार्थ और यहां तक सभी प्राणी उन्हीं की देन हैं। आधुनिक विज्ञान इस बात से सहमत है यद्यपि उसने इन पाँचों तत्वों के ही लगभग 128 उप-तत्त्व मालूम कर लिये हैं तथा उसका मत है कि इन्हीं के संचय (Combination_ तथा क्रमचय (Permutation) से सभी भौतिक पदार्थों और जन्म का विकास होता है।