
‘साम‘ शब्द का अर्थ है ‘गान‘।
सामवेद में संकलित मंत्रों को देवताओं की स्तुति के समय गाया जाता था।
सामवेद में कुल 1875 ऋचायें हैं।
जिनमें 75 के अतिरिक्त शेष ऋग्वेद से ली गयी हैं।
इन ऋचाओं का गान सोमयज्ञ के समय ‘उदगाता‘ करते थे।
सामवेद की तीन महत्त्वपूर्ण शाखायें हैं :-
कौथुमीय,
जैमिनीय एवं
राणायनीय।
देवता विषयक विवेचन की दृष्ठि से सामवेद का प्रमुख देवता ‘सविता‘ या ‘सूर्य‘ है, इसमें मुख्यतः सूर्य की स्तुति के मंत्र हैं किन्तु इंद्र सोम का भी इसमें पर्याप्त वर्णन है।
भारतीय संगीत के इतिहास के क्षेत्र में सामवेद का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। इसे भारतीय संगीत का मूल कहा जा सकता है।
सामवेद का प्रथम द्रष्टा वेदव्यास के शिष्य जैमिनि को माना जाता है।
वैदिक काल में बहुविध वाद्य यंत्रों का उल्लेख मिलता है जिनमें तंतु वाद्यों में कन्नड़ वीणा, कर्करी और वीणा, घन वाद्य यंत्र के अंतर्गत दुंदुभि, आडंबर,वनस्पति तथा सुषिर यंत्र के अंतर्गतः तुरभ, नादी तथा बंकुरा आदि यंत्र विशेष उल्लेखनीय हैं।