Category: ईश्वर

वेद के ऋषि

वेद के रचनेवाले ऋषियों को भूत तथा भविष्य का ज्ञान प्रत्यक्ष के समान होता है।उसमें इंद्रिय और अर्थ के सन्निकर्ष की आवश्यकता नहीं रहती।यह “प्रातिभ” (प्रतिभा से उत्पन्न) ज्ञान या “आर्षज्ञान” कहलाता है।यह ज्ञान विशुद्ध अत:करण वाले जीव में भी कभी कभी हो जाता है।जैसे – एक पवित्र कन्या कहती है – कल मेरे भाई […]

विश्राम

दिन भर कार्य करने से शरीर के सभी अंग थक जाते हैं।उनको विश्राम की अपेक्षा होती है।इंद्रियॉ विशेषकर थक जाती हैं और मन में लीन हो जाती है।फिर मन मनोवह नाड़ी के द्वारा पुरीतत् नाड़ी में विश्राम के लिए चला जाता है।वहाँ पहुँचने के पहले, पूर्वकर्मों के संस्कारों के कारण तथा वात, पित्त और कफ […]

गायत्री मंत्र

जब भी कोई व्यक्ति गायत्री मंत्र का पाठ करता है तो अनेक प्रकार की संवेदनाएं इस मंत्र से होती हुई व्यक्ति के मस्तिष्क को प्रभावित करती हैं।जर्मन वैज्ञानिक कहते हैं कि जब भी कोई व्यक्ति अपने मुंह से कुछ बोलता है तो उसके बोलने में आवाज का जो स्पंदन और कंपन होता है, वह 175 […]

दर्शन और विज्ञान

आज जब व्यक्तिगत स्तर, आर्थिक स्तर और सामाजिक यानी संस्थागत तीनो स्तर पर विषमता फैल रही है तो इस विषमता को सम में आप्त (समाप्त) करने का एक मात्र उपाय यानी प्रथम और अन्तिम उपाय है (दर्शन और विज्ञान) (सेन्स और साईन्स) (धर्म और विज्ञान) (ज्ञान और विज्ञान) (सांख्य और योग) (सिद्धान्त और कर्म) (थ्योरी […]

ब्रम्ह विज्ञान

वैदिक मनोविज्ञान ब्रम्ह विज्ञान से शुरू होता हैं।गुरु से की आप को गुरु की प्राप्ति कैसे हुई और किस किस्म के आप के गुरु हैं , आधुनिक मनोविज्ञान ने समानता के साथ भिन्नता भी हैं ,गुरु कैसा हो इस की परख भी होनी आवश्यक होता हैं, भगवान राम चन्द्र के भी गुरु थे फिर भी […]

मन के विज्ञान

‘‘मन के विज्ञान’’ को मनोविज्ञान कहा जाता हैं।भारतीय वाड्मय में उसकी प्रकृति पष्चिम के मनोविज्ञान के समान शैक्षणिक (Educational) नहीं होकर आध्यामित्क (Spiritual) हैं।अतः उसे ‘‘मन का ज्ञान’’ कहना अधिक सार्थक प्रतीत होता है।प्राचीन भारत में मनोविज्ञान को आत्मा के विज्ञान और चेतना के विज्ञान के रूप में लिया जाता है। भारतीय मनीषी आध्यात्मिक साधना, […]

सत्य, शिव और सौन्दर्य

सत्य, शिव और सौन्दर्य के बीच सम्यक सन्तुलन का नाम ही शास्त्रीय कला है | शास्त्र के खूँटे को तोड़कर विश्वामित्री सृष्टि रचने की उमंग को रोमांटिसिज्म कहते हैं | दोनों प्रवृत्तियों में वाद और प्रतिवाद की तरह संघर्ष चलता रहता है जिसका परिणाम है इतिहास |

धर्म निरपेक्ष

आज वामपंथी विचारधारा से बने इतिहास के अनुसार महिशासुर साम्प्रदायिक है, जबकि डायनासोर काल्पनिक होते हुए भी धर्म निरपेक्ष होता है. हमारी ज्ञान परम्परा को पहले फारसी में बाद में अंग्रेजी में रूपांतरित किया गया. यह हमारा दुर्भाग्य है कि हम उस अंग्रेजी के ज्ञान को हिन्दी में रूपांतरित करके पढ़ रहे हैं. पश्चिम के […]

ग्रन्थों के तत्व

भारत के सभी ग्रन्थों के केन्द्र में तीन तत्व अवश्य मिलेंगे –जीवन मूल्य,नैतिकता एवंसंस्कृति,असतोमासद्गमयतमसोमाज्योतिर्गमयमृत्योर्माअमृतम्गमय।भारत एक सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं नैतिक देश है। जीवन मूल्य के केन्द्र में अध्यात्म है, अध्यात्म न केवल वर्तमान बल्कि भविष्य की भी सोचता है।संस्कृति भारतीय इतिहास की जड़ मूल है। इतिहास हमारा कृतित्व है, जबकि संस्कृति संस्कार से जुड़ी है।सद्भावना, सहयोग, […]

त्योहार

देवभूमि भारत जो विश्व के मानचित्र में एकमात्र अकेला राष्ट्र है | वैदिक मंत्र अब दुनिया भर में गूंजने लगा है | हमारे ही देश में १९० से अधिक धर्म है जहाँ के २८ राज्यों व केन्द्रशासित प्रदेशों में हर धर्म के लोग नित्य कोई न कोई पर्व – त्योहार हर्षोल्लास के साथ मनाते ही […]