
किसी को गुरु-मन्त्र देने से उसके पापों और पुण्यों का उत्तरदायित्व गुरु के सिरपर चला आता है | जिसमें दूसरों के दोष धोने का सामर्थ्य हो वही गुरु बन सकता है | अमरकोष में ‘गुरु’ का पर्याय है “दोषज्ञ”, अर्थात जो शिष्य के छुपे पापों को जान सके (और दूर करने का उपाय कर सके)|
शिष्य की परिस्थिति और क्षमता के अनुसार अध्यात्म-मार्ग पर चलने का व्यवहारिक ज्ञान सम्यक रूप से प्रदान करने को सम्-प्रदाय की दक्षता देना है, अर्थात दीक्षा है |जिसके ज्ञान-चक्षु खुले नहीं, उसे गुरु बनने का अधिकार नहीं है |